शिक्षा और मुसलमान

 ज्ञान किसी भी देश और धर्म के विकास का उत्तरदायी होता है। मुस्लिम सबसे पिछड़े हैं, खासकर जब शिक्षा की बात आती है। जबकि इस्लाम में ज्ञान प्राप्त करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। इस्लामी विचारक अल्लामा इकबाल की कविता का उत्पाद भी मुसलमानों के लिए ज्ञान और शिक्षा के महत्व पर आधारित है।

इसके बावजूद, दुनिया भर में शिक्षा के मामले में मुसलमान अभी भी पीछे हैं। बिहार में मुसलमानों की बड़ी संख्या के बावजूद, शिक्षा के क्षेत्र में उनकी भागीदारी नहीं है।

वैसे भारत में साक्षरता का मतलब केवल अपना नाम लिखना-पढ़ना होता है। विकसित देशों में साक्षरता का पैमाना ऊंचा होता है। हमारे यहां साक्षर और शिक्षित के बीच बहुत ज्यादा फासला होता है। तमाम राजनीतिक दलों में बड़े-बड़े पदों पर मुसलमान नेता हैं। चुनाव के दौरान पार्टियां इन मुस्लिम चेहरों को मुसलमानों को लुभाने के लिए आगे कर देती हैं। धार्मिक नेताओं की तरह इनके एजेंडे में भी आधुनिक शिक्षा नहीं है।

दलितों से बाबा साहेब अंबेडकर ने एक ही बात कही थी शिक्षित बनो। दलितों के नेताओं ने कुछ हद तक शिक्षा का महत्व समझा, लेकिन मुसलमानों के नेता आज भी शिक्षा का महत्व समझने को तैयार नहीं हैं। मुसलमानों सहित भारत के आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े सभी समुदायों का कल्याण शिक्षा की मुहिम चलाकर ही किया जा सकता है, जब तक ये समुदाय इस बात को नहीं समझ लेते, वे पिछड़े ही रहेंगे। मुस्लिम नेताओं को अपनी राजनीति वहीं से शुरू करनी होगी, जहां से अंबेडकर दलितों की राजनीति शुरू करना चाहते थे।

लेखक : इमरान गाज़ी


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